राष्ट्रकवि – ओज, राष्ट्रीय चेतना और संस्कृति के सशक्त कवि
प्रस्तुतकर्ता : Hebbare Manikantha Rao, Guest faculty in Hindi
हिन्दी साहित्य के महान कवि, चिंतक एवं विद्वान
राष्ट्रवाद तथा वीर रस के श्रेष्ठ कवि
“राष्ट्रकवि” की उपाधि से अलंकृत
23 सितम्बर 1908 – सिमरिया घाट, बेगूसराय (बिहार)
कठिन परिस्थितियों में शिक्षा
संस्कृत, हिन्दी एवं इतिहास में रुचि
उर्वशी, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतिज्ञा
असंभव के सामने, संस्कृति के चार अध्याय
कर्ण के चरित्र का महाकाव्यात्मक चित्रण
संघर्ष एवं न्याय की भावना से परिपूर्ण
“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”
“क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो”
दिनकर एक अमर राष्ट्रकवि
उनकी रचनाएँ सदैव प्रेरणा देती रहेंगी
1️⃣ दिनकर — ‘रश्मिरथी’
2️⃣ ‘संस्कृति के चार अध्याय’
3️⃣ हिन्दी साहित्य इतिहास एवं शोध स्रोत