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कुंवर नारायण: एक नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर

कुंवर नारायण: एक नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर

कुंवर नारायण: एक नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर

लेखक: विजय पटिल जी

कुंवर नारायण, जो नई कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं, अपनी रचनाओं में इतिहास और मिथक के माध्यम से वर्तमान को देखने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। उनकी कविताएँ हमें सोचने पर मजबूर करती हैं, और उनके शब्दों में गहरी संवेदना और सामाजिक चेतना का अद्भुत समावेश होता है।

आज उनकी जयंती पर, हम उनके कुछ अद्भुत विचारों को साझा करते हैं, जो हमारे देश और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए उनकी चिंता को दर्शाते हैं। उनकी कविता का एक अंश हमें यह याद दिलाता है कि हमें न केवल अपने देश, बल्कि अपने पर्यावरण की भी रक्षा करनी है:

“देश को बचाना है
देश के दुश्मनों से
बचाना है नदियों को नाला हो जाने से
हवा को धुआं हो जाने से
खाने को जहर हो जाने से,
बचाना है जंगल को मरुस्थल हो जाने से
बचाना है मनुष्य को जंगल हो जाने से”

कुंवर नारायण की यह रचना हमें यह समझाती है कि वर्तमान समय में हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने की कितनी आवश्यकता है। उनके शब्दों में छिपा एक गहरा संदेश है कि यदि हम अपने पर्यावरण का ध्यान नहीं रखेंगे, तो हम न केवल प्राकृतिक सौंदर्य को खो देंगे, बल्कि हमारी संस्कृति और मानवता भी संकट में पड़ जाएगी।

कुंवर नारायण की कविताएँ हमें प्रेरित करती हैं कि हम अपने चारों ओर के वातावरण की सुरक्षा करें और इसके प्रति जागरूक रहें। उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और हमें हर क्षण सतर्क रहने की आवश्यकता का अहसास कराती हैं।

उनकी जयंती पर हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनकी कविताओं से प्रेरणा लेकर एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ने का संकल्प लेते हैं।

कुंवर नारायण को नमन!

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